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Munish Dixit

Dainik jagran, Dharamshala (H.P.)
Year of Exp: 11 years
Age: 33 year old

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…जब प्रकृति विनाश के आगे सब ठहर गया था

Posted On: 21 Jun, 2013  
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खुद ज्ञान से भटकने लगे मेरे देश के लोग

Posted On: 29 Dec, 2012  
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शहादत के बाद भी जंग जारी

Posted On: 26 Jul, 2012  
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तीन चिडिय़ां..और मिल गया बचपन के सवाल का जबाव

Posted On: 27 Mar, 2012  
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फेसबुकिया बुखार, अस्पताल भी लाचार

Posted On: 20 Mar, 2012  
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यहां मीडिया नहीं, टोपी करती है चुनावी सर्वेक्षण

Posted On: 18 Mar, 2012  
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क्या यही है आजादी के मायने

Posted On: 14 Aug, 2011  
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दलाईलामा की शक्तियों का हस्तांतरण एक बड़ी चुनौती

Posted On: 26 May, 2011  
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वो पाकिस्तान से अब भी लड़ रहे है लड़ाई

Posted On: 19 Feb, 2011  
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सभी प्रदेशों में पॉलीथीन पर प्रतिबंध क्यों नहीं?

Posted On: 6 Feb, 2011  
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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

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लेख तो अच्छा है पर कुछ अधुरा सा प्रतीत होता है. जब देश के नौजवान नागरिक ही चुप बैठ जाएँगे तो अपराधी तो अपने आपको ताकतवर समझेगा ही. अंतिम पंक्तियों से में बहुत ही आहत हू. समस्या का समाधान देने के बजाए आपने हमें कमजोर बताया. जबकि हमारे एक वोट के लिए नेता हमारे पैरो पर गिर जाते है तो हम कमजोर कैसे हो सकते है. कमजोर तो वो है. हा क्योकि हम अपने वोट का सही इस्तेमाल नहीं करते यह हमारी कमजोरी है. पर जब हमारे सामने कोई सही विकल्प ही नहीं है तो हम चुने किसे. हाल ही में एक ऐसा चिन्ह बनाया गया जिसका अर्थ था की हम किसी भी नेता को वोट नहीं देते हमें अच्छे विकल्प चाहिए. कितने लोगो ने इसका इस्तेमाल किया. अनपद लोग जाति, धर्म और आरक्षण के नाम पर वोट देते है. शहरी इलाको में लोगो के पास समय ही नहीं है. वो उसके पोस्टर को देखकर वोट देते है. कमजोरी तो हमारी है. पर इसका मतलब यह नहीं की नेता सक्तिशाली है. वो तो हमसे भी कमजोर है. जरुरत है तो सिर्फ इतनी की हम सही फैसला ले जो ना सिर्फ हमारी बल्कि पुरे देश के नवनिर्माण की नीव रखे.

के द्वारा: yogeshdattjoshi yogeshdattjoshi

के द्वारा: ajaydubeydeoria ajaydubeydeoria

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आजादी की वास्तविकता जानना हो तो हमें उन परिस्थितियो और सत्तालोलुपता की लालसा की प्राप्ति के लिए देश के बटवारे को ब्रिटिश लोर्ड मौन्ट बटन ने अपनी योजना के अनुसार जवाहर लाल नेहरू को अपनी मैडम को चारे के रूप में इस्तेमाल कर देश के बटवारे और खून की नदियो के बहाने पर एक टुकडे के रूप में आजाद हुए जरा उस संविधान के निर्मद प्रक्रिया पर निगाह डाले द्वितीय युध्ध के बाद १९४६ तक ब्रिटिश यह अच्चितरह आभाष हो गया था की उन्हें भारत से जाना होगा मार्च १९४६ में ब्रिटिश प्रधानमंत्री लोर्ड एटली ने अपने मंत्रिमंडल के तीन सदस्यों का प्रतिनिधि मंडल भेजा इसे ही कैबिनेट मिसन के नाम से जाना जाता है इसे देश के सभी राजनितिक,राजाओ ,पुजीपतियो से मिल कर सत्ता ह्स्तानानरण की योजना बनायेगे और इसी के क्रम कबिनेट मिसन ने योजन अपनी शर्तो के साथ घोषी केर दी (१)भारत का बटवारा नहीं होगा/ इसका ढांचा संघीय होगा १६ जुलाई १९४८ को हस्तांतरित की जाएगी इसके पूर्व सघीय भारत का संविधान का निर्मद कर लिया जायेगा (२) संविधान लिखने के लिए ३८९ सदस्यों की संविधान सभा का गठन किया जायेगा जिसके ८९ सदस्य देशी रियास्तानो के प्रमुख होगे (३) शेष ३०० सदस्यों का चुनाव बरिश शाशित प्त्रन्त के विधायिका द्वारा किया जजेगा इन ३०० सीटो में मुसलमानों ७८ सीटो का चुनाव मुस्लिम मतदाताओ द्वारा किया जायेगा ( यहाँ यह बात उल्लेखनीय है की ब्रिटिश शशित विधान सभाओ का चुनाव "भारत भारत सकार अधिनियम१९३५ द्वारा सीमित मताधिकार द्वारा हुआ था उक्त अधिनियम के अनुसार मात्र १५% लोगो को ही मत देने का अधिकार था शेष ८५% लोग मताधिकार से बंचित थे (४)संविधानसभा संप्रभुता संपन्न नहीं होगी यह कैबिनेट मिसन प्लान के अनेर्गत संविधान लिखेगी जिसे लागु करने के लिए ब्रिटिश सरकार की स्वीकृति अनिवार्य होगी | (५)इस दौरान भारत का शाशन प्रबंध्भारत अर्काट अधिनियम १९३५ के अधीन जिसके लिए केंद्र में एक सर्व्दकिय सरकार गठित की जाएगी | जुलाई १९४६ में संविधान सभा का चुनाव हुआ जिस्मी कांग्रेस को १९९ सीते और १३ का समर्थन प्राप्त हुआ मुस्लिम लीग को ७२ सीते मिली १५ पर एनी लोग जीते अभी संविधान सभा की बैठक भी नहीं हुई थी की सीढ़ी कार्यवाही का नारा मुस्लिम लीग द्वारा दिया गया लिहाजा मुस्लिम लीग ने भी संविधान सभा का बायकाट जरी रख हाला की मंत्रिमंडल में उनका पूरा प्रतिनिधित्व था ९ सितम्बर १९४६ को संविधान सभा की पहली बैठक बुलाई गयी जिसमे राजेन्द्र प्रसाद जी को अध्यक्छ चुना १३ दिसम्बर तक संविधान की प्रस्तावना पेश की गयी और २२ जनवरी १९४७ को स्वीकार कर ली गयी.मुस्लिम लीग और रियासतों के मनो नीट सदस्यों के बोयकट के बाद महज १५% वयस्क मताधिकार के द्वारा चुनेगाये सदस्यों के भी मात्र ५५% ने इसे स्वीकार किया और उसे पारित करने हेतु भेज दिया केशवानंद भातीय बनाम केरल राज्य(१९७३) केस के सम्बन्ध में ;संविधान सभा को संविधान बनाने के लिए भारतीय जनता ने नहीं ब्रिटिश संसद ने अधिकृत किया था उक्त संविधान सभा का चुनाव सार्विक मतद्गिकर के आधार पर नहीं बल्कि १५ फीसदी उच्च वर्गीय नागरिको द्वारा परोच्च मताधिकार से हुआ था जष्टिश मैथु ने स्पष्ट रूप से कहा "यह सर्व विदित है की संविधान में किया गया बेड़ा ऐतिहासिक सत्य नहीं है | अधिक से अधिक इतना कहा जा सकता है की संविधान लिखने का कम जिस संविधान सभा द्वारा किया गया वह १५% नागरिको द्वारा परोच्च मतदान द्वारा हुआ था और कौन ऐसा होगा जो उन्ही १५% लोगो को पूरा भारत मन लेगा. यही वजह की अज आजादी के ६३ साल बाद भी संविधान और कानून दरोगा जी के जेब में रहता है कचहरी में वही नजराना,सुकराना,कुर्की नीलामी वही सी.आर.पीसी वही हवालात बल्कि लाठियो गोलिओ की गिनती करना मंवाधिकरिया वादियो के लिए भी असंभव हो चूका है धूमिल की कविता के कुछ अंस यहाँ लोगो को समझा दिया गया है की इस जनतंत्र में इनकी श्रधा अटूट है यहाँ भोडे और आदमी को खाने के लिए एक जैसी छुट है हाय यह कैसा झूठ है अपने यहाँ जनतंत्र एक ऐसा तमाशा है जिसकी जुबान मदारी की भाषा है.

के द्वारा: shuklaom shuklaom

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ये बड़े ही दुःख का विषय है........ एक और हमारे शहीदों के साथ सरकारें इस तरह की उपेक्षा का बर्ताव करती हैं और दूसरी और रक्षा बजट के नाम पर कई हज़ार करोड़ रुपए बहाए जाते हैं......... लड़ाई केवल हथियारों से नहीं लड़ी जा सकती........ यूँ ही वीर सैनिक इस तरह उपेक्षित होते रहे ........ और उनकी शहादत के बाद उनके परिवार वालों को सौरव कालिया के परिजनों की तरह परेशां होता रहना पड़ा तो भले ही कई हज़ार करोड़ रुपए से अतिआधुनिक हथियार सेना में शामिल कर लिए जाये पर ....... देश के लिए मर मिटने को तैयार सैनिक खोज पाना मुश्किल हो जायेगा........ और जंग हथियारों से नहीं सिपाहियों के हौसलों से लड़ी जाती हैं ......... ये सरकारों को समझना होगा................. सार्थक लेख ......... बधाई........

के द्वारा: Piyush Pant, Haldwani Piyush Pant, Haldwani

plz. publish and send me link thanks with regards lamba anil journlist karnal (haryana) अफसरों पर नकेल नहीं कस पाए हुड्डा अफसरों की मनमानी से परेशान हैं हुड्डा मंत्री-मंडल के कईं साथी आखिर क्या कर रहे हैं हुड्डा के साथी.........................? हुड्डा की नीतियाँ और नीयत भी नहीं पहुँच पा रही लोगों के बीच करनाल(अनिल लाम्बा) : बीते दिनों एक साथ ग्यारह अधिकारियों का प्रदेश भर से तबादला और अफसरों की मनमानी तथा सरकार में ही मौजूद कईं मंत्रियों की अफसरों द्वारा बात न मानना इस बात के संकेत हैं की हुड्डा अपनी ही सरकार में अफसरों पर नकेल नहीं कस पाए | इसमें भी प्रदेश के मुख्यमंत्री का दोहरा मापदंड नज़र आ रहा है | हो सकता है कि यह सब मुख्यमंत्री के इशारे पर हो रहा हो या फिर अफसर ही मुख्यमंत्री को दरकिनार कर रहे हैं | बीते दिनों जिन ग्यारह अधिकारियों का एक साथ तबादला किया गया, उससे साफ़ जाहिर हो गया है कि अफसरों क़ी मनमानी से खुद हुड्डा भी परेशान नज़र आ रहे हैं या फिर उन्होंने दबाव के चलते अफसरों क़ी उठापटक कर दी | चंडीगड़ में हुए युवा सम्मेलन में वितमंत्री कैप्टन अजय यादव के बेटे चिरंजीवी द्वारा जिन मंत्रियों को आमंत्रित किया गया था, उनमें कुमारी शैलजा, मंत्री रणदीप सुरजेवाला, कैप्टन अजय यादव व् सांसद वीरेंदर सिंह मौजूद दिखाई दिए | हैरानी क़ी बात है कि इस सम्मलेन में खुद मुख्यमंत्री को पहुंचना था और वह चंडीगड़ में थे लेकिन सी.एम्. नहीं आये मगर परेशान करने वाली बात यह रही कि हुड्डा के करीबी खुद मौलाना मुख्यमंत्री के खिलाफ तैयार क़ी गई लाब़ी में खड़े दिखाए दिए | आपको बता दें क़ि रणदीप सुरजेवाला से कईं महैकमें वापिस ले लिए गए हैं | वीरेंदर और हुड्डा के बीच पहले से ही छतीस का आंकडा है वहीं पर कुमारी शैलजा हाल ही में नारायानगढ़ क़ी रैली में बरस चुकीं हैं | कैप्टन अजय यादव पहले से ही भूमि अधिग्रहण के मामले में अपने आपको हुड्डा का विरोधी साबित कर चुकें हैं | क्या फूलचंद मुलाना सी. एम्. के जासूस बनकर आये थे या फिर वह भी मुख्यमंत्री विरोधी खेमें में शामिल हो गएं हैं | यह बात भले ही राजनीति क़ी है लेकिन सोचने क़ी बात यह है क़ी सभी के सभी प्रदेश क़ी अफसर लौबी से लम्बे समय से परेशान रहे हैं | बीते दिनों चंडीगढ़ में एक अधिकारी द्वारा एक नेता को ठेंगा दिखाए जाने के बाद इस बात के भी संकेत मिले हैं क़ि अफसरशाही नेताओं पर हावी है | हाल ही में घरौंडा में भी एक अधिकारी ने एक कांग्रेस के ही नेता से तूं-तड़ाक क़ी थी | मगर बाद में दूसरे नेताओं ने बीच बचाव करते हुए मामला निपटाया | हालांकि चर्चा तो यह है क़ि अधिकारी ने नेता को थपड रसीद कर दिया था लेकिन इसकी पुष्टि न होने पर यह मीडिया क़ी सुर्खियाँ नहीं बन पाया | वैसे प्रदेश के मुख्यमंत्री पद पर हुड्डा क़ी ताजपोशी होने के बाद विपक्षी नेताओं ने कम मगर उनके ही विरोधियों ने उन्हें घेरने क़ी कोशिशें तो जारी रखीं मगर सोनिया गांधी से काफी मजबूत रिश्तों के कारण हुड्डा का सिंहांसन डगमगा नहीं पाया | हुड्डा क़ी सरकार उस समय अधिक चर्चा में आईं जब गुडगाँव में होंडा कर्मचारियों और मालिकों के बीच उपजे विवाद में चली पुलिस क़ी लाठियां मीडिया में छा गयीं | इलेक्ट्रौनिक्स चैनल में खबर आने के बाद तौ हुड्डा सरकार के पसीनें छूट गएँ मगर उसके एन बाद गोहाना में दलित काण्ड होने के बाद हुड्डा सरकार एक बार फिर चर्चा का विषय बनी | जूता कम्पनी के कर्मचारियों पर पुलिस का लाठीचार्ज, मधुबन परिसर में औद्योगिक पुलिस कर्मियों का आन्दोलन और उसके बाद भजनलाल और हुड्डा क़ी राजनीति के मैदान में चली जंग भले ही न थमी हो मगर प्रदेश के मुख्यमंत्री भूपेंद्र सिंह हुड्डा के सियासी विरोधी हमेशा इसी ताक़ में रहे हैं क़ि किसीं तरह हुड्डा सरकार कांग्रेस क़ी राष्ट्रीय अध्यक्ष श्रीमती सोनिया गांधी क़ी नज़रों से नीचे उतर जाए ताकि हुड्डा के राज को अपनी मुठी में बंद किया जा सके | विरोधियों के तमाम बागी तेवरों के चलते प्रदेश के मुख्यमंत्री भूपेंद्र सिंह हुड्डा परेशान तौ रहे | मगर जो नेता यह चहाते थे क़ी हुड्डा प्रदेश के मुख्यमंत्री के रूप में काबिज हो जाएँ वह अब मुख्यमंत्री भूपेंद्र सिंह हुड्डा क़ी सरकार को महत्व देने क़ी बजाए नज़रअंदाज करने का कार्य कर रहे हैं | आखिर हुड्डा के पुराने वफादार साथी प्रदेश क़ी जनता के बीच में जाकर क्या कर रहे हैं ?

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शहीद कै विक्रम बतरा के साथ बहुत पुराने संबंध रहे हैं बचपन में उनके साथ काफी समय गुजारने का मौका मिला था वतन के लिए कुछ करने का जज्‍बा उनमें शुरु से ही था कारगिल युद्व के दौरान टीवी पर उनका इंटरव्‍यु देखा तो मन गदगद हो गया अब उनकी यादें ही शेष हैं और देश के हर नागरिक का फर्ज है कि विक्रम जैसे चीर सपूतों की याद को हमेशा ताजा रखे मुनीष ये लेख काफी अच्‍छा है पर खुश्‍ाी तब होगी जब पत्रकार वर्ग मिलकर शहीद बतरा की उस प्रतिमा का बदलवाने में सफल होगा जो बतरा मैदान के पास स्‍थापित की गई है पर सब जानने वालों की राय है कि प्रतिमा शहीद बतरा से मेल नहीं खाती यदि हम मिलकर ऐसा कर पाए तो वह उस शहीद को सच्‍ची श्रद्वांजली होगी   शुभकामनाएं

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मुनीष जी अभिवादन, यूं कह सकते है की हिमाचल भूमि अपने अंतर में एक विशेतता लिए हुए है. हिमाचल प्रदेश इस देश का एक ऐसा प्रदेश है, जो आये दिन पूरे देश के समक्ष तमाम उदहारण प्रस्तुत करता रहता है. कई बार यह राज्य बहुत ही सारगर्भित पहल करता है, जो अन्य राज्यों के लिए कई मायनो में अनुकरणीय होता है. इस राज्य की राजनीती में विवाद नहीं होता है, ऐसा नहीं है, लेकिन फिर भी कुछ है, जो इसके विकास को सुचारू बनाता है, इस प्रदेश के राजनीतिज्ञ अन्यो से बहुत अलग नहीं है, लेकिन कुछ ऐसा है, जो इस राज्य को अन्य के समक्ष उदहारण प्रस्तुत करने को प्रोत्साहित करते है. ये पहाड़ी राज्य अपने आँचल में बहुत कुछ ऐसा लिए हुए है, जिसकी तारीफ हमें करनी ही होगी. धन्यवाद. - तुफैल ए. सिद्दीकी http://siddequi.jagranjunction.com

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